Tuesday 29 September 2020

इक कश तो आह भर 

पल पल में बहार  

इक पल में ही 

बारिश की फुहार 

वक्त बेवक़्त बहती 

रूमानी पुरवाइयाँ 

घड़ी भर गुनगुनाती 

धूप लम्हां लम्हां 

ख्वाहिशों के बादल 

ओढ़े शामों सहर 

कही अनकही छांव की 

करवट हर पहर 

रुबेरु हो इक दफ़ा 

तेरा फ़लसफ़ा 

ये शहर है जो दिलक़श 

इक कश तो आह भर 



Thursday 17 September 2020

ये मन कभी सँभलता ही नहीं 

सांसें अब मेरी बेकाबू सी रही 

जानें कैसा खुमार 

है दिल पे चढ़ा 

खानाबदोश राहों पे ही 

क्यों ये चल पड़ा 


ये मंज़र मेरे रंग सा है 

बेफिक्र उड़ता फिरता मैं 

ये जहाँ सारा मलंग सा है 

थोड़ी सी धुप है छाँव है 

खुली दिशाएं और 

मंज़िल अनजान कहीं 


सफर में छिपी कैसी ये धुन है 

फिकरे सारी कहाँ गुम है 

बेगानी राहों पे संग ये परछाइयाँ 

मिलों दूर, दूर तक बस मेरी बेताबियाँ 


थोड़ी सी है ज़िन्दगी ये बेरुखी क्यों ?

देखो मौसम ने ली है करवटे 

रूखे सूखे रास्तों पे 

गुदगुदा रही ये बेचैन हवाएं

हर तरफ हर लम्हों में आवारगी 

हम चले है ये राहें अनकही 










e man kabhi sambhalta hi nahi 

Saanse ab meri Bekabu si rahi

Jaane kaisa khumar hai 

dil pe chadha 

Khanabadosh raho pe hi 

Kyu ye chal pada 


Ye manzar mere rang sa hai

Befikar Udta chadta parinda 

Ye jahan saara malang sa hai

Ye savera hai naya

Manmauji lfange


Safar me chhipi kaisi ye dhun hai

Fikre saari kahan gum hai

Begani raho pe dhundhti bechaniya 

Milo door Door tak bas meri betabiyan 


Rubooru ye shahar ye gaon 

Ye banshide ye gharonde 

Chhode hai saare sapne

Tumhare ab hai Hawale