Tuesday, 29 September 2020

इक कश तो आह भर 

पल पल में बहार  

इक पल में ही 

बारिश की फुहार 

वक्त बेवक़्त बहती 

रूमानी पुरवाइयाँ 

घड़ी भर गुनगुनाती 

धूप लम्हां लम्हां 

ख्वाहिशों के बादल 

ओढ़े शामों सहर 

कही अनकही छांव की 

करवट हर पहर 

रुबेरु हो इक दफ़ा 

तेरा फ़लसफ़ा 

ये शहर है जो दिलक़श 

इक कश तो आह भर 



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