Wednesday, 25 March 2020

ख्वाबों के बस्ते खुलने तो दो

ख्वाबों के बस्ते खुलने तो दो
हवाओं को रास्ते सजाने तो दो
हम चले इन मुस्कुराती राहों में
अब जाना कहाँ है, क्या पता

कल की किस को फिक्र हैं
सब धड़कने अब तेज हैं
अनजानी कश्तियों पे सवार
किनारे अब दूर हैं

वक्त है तो हंसने दे
दर्द है तो मिटने दे
फासलों को अब टूटने दो
इन लम्हो को यूँ ही जीने दो
ख्वाबों के बस्ते खुलने तो दो
हवाओं को रास्ते सजाने तो दो

हज़ारों सवाल, ढूँढूं क्या
जब मिल गया ये जहान
ज़िंदगी के सफर पर
लिख दो ये दास्तान





Sunday, 22 March 2020

चलिए एक सवांद करते हैं
आसमं में उड़ते परिंदों का शोर
और
पिंजरे में क़ैद इंसानो की ख़ामोशी !

अजीब शख्स है, रोज़ फ़िज़ूल के बाते करता हैं
मैं चाहता हूँ आज करे तो चुप्पी साध बैठा है !

एक शाम
भूली- बिसरी यादें
बेफ़िक्र सी हंसी
हज़ारों लफ़्ज़ों की ख़ुशी
और दो पल जीने की खाव्हिश !


सुनसान सी गलियों में
आज घरो के सारे झरोखे
खुलने दो
अधूरी हसरतों को आज
जी भर जी लेने दो

आज मुज़्दा ये है
मेरी तन्हाई ने आज
एक फरमान जारी किया
तू, तेरी ज़ीस्त, तेरी जुस्तजू
सब कुछ मैं ही तेरा
एक गम - गुसार!

Khwabon ke baste khulne to do
Hawon ko raaste sajane to do
Hum chale in muskurati rahon me
Ab Jaana kahan h, kya pata

Kal ki kis ko fikar hai
Sab dhadkane ab tez hai
Anjaani kashtiyon pe sawaar
Kinare ab door hai

Vakt h to hasne de
Dard h to mitne de
Faslon ko ab tutne do
In Lamhon ko yun hi jeene do
Khwabon ke baste khulne to do
Hawon ko raaste sajane to do

Hazaro sawal, dhundhun kya
Jab mil gya ye jahan
Zindagi ke safar par
Likh do ye dastan

ख्वाबों के बस्ते खुलने तो दो
हवाओं को रास्ते सजाने तो दो
हम चले इन मुस्कुराती राहों में
अब जाना कहाँ है, क्या पता

कल की किस को फिक्र हैं
सब धड़कने अब तेज हैं
अनजानी कश्तियों पे सवार
किनारे अब दूर हैं

वक्त है तो हंसने दे
दर्द है तो मिटने दे
फासलों को अब टूटने दो
इन लम्हो को यूँ ही जीने दो
ख्वाबों के बस्ते खुलने तो दो
हवाओं को रास्ते सजाने तो दो

हज़ारों सवाल, ढूँढूं क्या
जब मिल गया ये जहान
ज़िंदगी के सफर पर
लिख दो ये दास्तान


Sune shahar veeran kuche
Khule aasmaan me
Udte Parindo ka shor
Aur gulzaar sa ek ghar
Chaliye ek Takreer ho jaye
Tum aur Mein, Ek Safar











































यूँ ही घर की दीवारें
अक़्सर इंतज़ार में सालों गुजार देती हैं 
अनसुनी दास्तान, अनकहे अल्फ़ाज़ 
अधूरी ख्वाहिशों की लम्बी फेहरिस्त 
एक अरसे बाद मयस्सर फुर्सत के पल 
आइये एक शाम कुछ मुख़्तलिफ़ 
गुफ्तुगू हो जाये !

अगर सफर पर अधूरी ख्वाहिशें लेकर चल रहे हो तो
समंदर की गहराईओं से उन्हें मुलाकात करवाईये
ना जाने क्यूँ अक्सर लहरें
सुकून से किनारे ढूँढ ही लेती हैं

अक्सर आशियानों को तन्हाई समेटते देखा है
हजारों लफ्जों को आज सुकून भरे एक कप चाय में घुलते देखा है!

Tuesday, 31 December 2019

अतीत की दास्तान के पिटारे को बंद कीजिये
और समंदर की गहराइयों में उसे छोड़ दीजिये
भूलने -भुलाने की ये कवायद ताउम्र जारी रहे| 
साल दर साल बदलते रहे नए साल आते रहे
सूरज की नयी किरणें, हजारों ख्वाहिशें लियें
ज़िंदगी के हर कदम हर मुकाम पर
बेसब्री से पहुँचने की जिद पर अड़ी हैं
ज़िंदगी का मेरा यही फ़लसफ़ा रहा है
जियें अलहदा सी ज़िंदगी को
एक खूबसूरत लम्हात में
एक अल्हड़ मन के साथ !


Thursday, 4 July 2019

क्यूँ फ़िज़ूल की बातों पर अड़े हों 
ये सुहाना मौसम रूहानी सी हवाएं 
दो पल सुकून में लिपटे 
ज़िंदगी को तहे  दिल से शुक्रिया कहे 

बारिश का मौसम 
मिट्टी की सोंधी खुशबु 
फ़ुर्सत के दो पल 
और 
एक कप चाय 

थोड़ी सी सहूलियत मिली हैं 
ये शहर भी अनजान सा हैं 
चलिए रास्तों से कुछ गुफ़्तुगू 
करते है 

ये दरख़्त 
अक्सर हवाओं से 
कुछ बाते किया करते है 
ना जाने ज़िंदगी में 
कितने खाली कितने भरे हैं 
पर हर पल हर पतझड़ में 
सफर के भागीदार हैं 




Monday, 19 February 2018

शहर कुछ बदल सा गया हैं
नहीं तो, मुझे तो नहीं लगता
वहीं इमारतें वही रास्तें
शायद आप बदल गए हैं
मैं
मैं तो वहीं बैठा हूँ
क्यों फिर आज आप
अकेले इतमीनान से
बैठे नहीं उस बेंच पे
ठिकाने आप भी बदल रहे है
क्यों न बदलूँ !
यूँ ही दरख़्त साथ आने लगे है
कुछ शिकवे है अब इनसे भी
महज तन्हा सफर अब कोलाहल
चलिए छोड़िये
नए बंदोबस्त करने दीजिये









Saturday, 23 December 2017


        वक्त और नियति का अजीब खेल !                                        


ज़िंदगी किसी कोने में किबाड़ की ओट में फंसी सी लग रही है | हर पल बितता समय एक असमंजस की घडी में जाके टिक गया है, ऐसा लग रहा है शायद वक्त आप को अकेले रेगिस्तान में छोड़कर कही सैर सपाटे पे निकल गया है|  ये भी हो सकता है की ये एक समय की चाल हो पर कितने इम्तिहान लिए जायेंगे इस सूखे पड़े एकांत रेगिस्तान में | वक्त को ये भी पता है की मेरे क्रूर वार को कब तक सहेगा एक इंसान उसे किसी न किसी दिन टूट जाना है पर नियति अपना ही खेल खेलती है, एक इंसान जो इतना टूट गया है उसे वक्त के सामने घुटने टेकने नहीं देती | यूँ भी कहें ये वक्त और नियति की साझा चाल हो जो दोनों आपस में मिलकर खेल रहे हो | नियति की सरहाना की जानी चाहिए वो मित्र क्यों न हो पर विधान ये ही कह रहा है की नियति भी अपने अंदर छुपे इंसानियत को दबा नहीं सकी और इंसान को एक मौका देने की कोशिश में लगी हुई है | वक्त और नियति दोनों ही अपना खेल खेल रहे है अब इंसान को तय करना है अपना दॉंव ,की वो इस खेल को कहाँ ले जाता है | खेल में शह और मात लगा रहता है | देखना अब ये बाकी रह गया है की इंसान इस शतरंज के खेल में किस खाने में अपनी चाल चलता है | उसकी अगली चाल से ये निर्णय हो सकता है की वो इस खेल को कबतक जारी रखना चाहता है | जल्दी से जल्दी इंसान इस खेल के दांव सीख ले उसके लिए अच्छा है क्यों की ज़िंदगी एक मुसाफिर है | शायद इंसान अगले पल किसी डगर पर वक्त के सितम में फंसा हुआ नज़र आये | इस छोटी सी ज़िंदगी में हज़ारों दास्ताने लिखी जा चुकी है | अब इंसान को ये निर्णय लेना है की वो इन हज़ारो दास्तानों में से किसका ताला खोलता है चाबी उसी के पास है | अब आप प्रतीझा करे या चुनौती स्वीकार करे ये आप के ऊपर निर्भर करता है |