Monday, 19 February 2018

शहर कुछ बदल सा गया हैं
नहीं तो, मुझे तो नहीं लगता
वहीं इमारतें वही रास्तें
शायद आप बदल गए हैं
मैं
मैं तो वहीं बैठा हूँ
क्यों फिर आज आप
अकेले इतमीनान से
बैठे नहीं उस बेंच पे
ठिकाने आप भी बदल रहे है
क्यों न बदलूँ !
यूँ ही दरख़्त साथ आने लगे है
कुछ शिकवे है अब इनसे भी
महज तन्हा सफर अब कोलाहल
चलिए छोड़िये
नए बंदोबस्त करने दीजिये









Saturday, 23 December 2017


        वक्त और नियति का अजीब खेल !                                        


ज़िंदगी किसी कोने में किबाड़ की ओट में फंसी सी लग रही है | हर पल बितता समय एक असमंजस की घडी में जाके टिक गया है, ऐसा लग रहा है शायद वक्त आप को अकेले रेगिस्तान में छोड़कर कही सैर सपाटे पे निकल गया है|  ये भी हो सकता है की ये एक समय की चाल हो पर कितने इम्तिहान लिए जायेंगे इस सूखे पड़े एकांत रेगिस्तान में | वक्त को ये भी पता है की मेरे क्रूर वार को कब तक सहेगा एक इंसान उसे किसी न किसी दिन टूट जाना है पर नियति अपना ही खेल खेलती है, एक इंसान जो इतना टूट गया है उसे वक्त के सामने घुटने टेकने नहीं देती | यूँ भी कहें ये वक्त और नियति की साझा चाल हो जो दोनों आपस में मिलकर खेल रहे हो | नियति की सरहाना की जानी चाहिए वो मित्र क्यों न हो पर विधान ये ही कह रहा है की नियति भी अपने अंदर छुपे इंसानियत को दबा नहीं सकी और इंसान को एक मौका देने की कोशिश में लगी हुई है | वक्त और नियति दोनों ही अपना खेल खेल रहे है अब इंसान को तय करना है अपना दॉंव ,की वो इस खेल को कहाँ ले जाता है | खेल में शह और मात लगा रहता है | देखना अब ये बाकी रह गया है की इंसान इस शतरंज के खेल में किस खाने में अपनी चाल चलता है | उसकी अगली चाल से ये निर्णय हो सकता है की वो इस खेल को कबतक जारी रखना चाहता है | जल्दी से जल्दी इंसान इस खेल के दांव सीख ले उसके लिए अच्छा है क्यों की ज़िंदगी एक मुसाफिर है | शायद इंसान अगले पल किसी डगर पर वक्त के सितम में फंसा हुआ नज़र आये | इस छोटी सी ज़िंदगी में हज़ारों दास्ताने लिखी जा चुकी है | अब इंसान को ये निर्णय लेना है की वो इन हज़ारो दास्तानों में से किसका ताला खोलता है चाबी उसी के पास है | अब आप प्रतीझा करे या चुनौती स्वीकार करे ये आप के ऊपर निर्भर करता है | 

Thursday, 30 November 2017

समय के सितम का भी एक खास अनुभव रहा | ये वक्त बीत जाना था,जो बीत के समाप्त हो चुका | कुछ पल हंसी के, कुछ गम के आगोश में बीते हुए कल की ये दस्तक, आज भी किसी किबाड़ की ओट में फंसी सी लग रही हैं | अकेले सफर में रास्तें कितनी दूर थे,आज भी इसकी कुछ यादें मन के एक कोरे कागज़ पर सिमटी हुई हैं | जीवन की यात्रा अपने राह में चलती हुई दूसरे छोर पर आ खड़ी हुई हैं | मालुम है ज़िंदगी को जुल्म के सवाल भी बहुत है पर वक़्त के क्रूर होते सितम को ये मुस्कुराते हंसी पलों का जवाब हैं |  

वक़्त के क्रूर होते सितम को मुस्कुराते हंसी पलों का जवाब आया हैं...... 

#Words #VaktKaSitam

Monday, 27 November 2017

     रास्तों के शोर में कोई गुम हैं
    अनजान से अतरंगी सफर में 
   ये अनसुने से सतरंगी आवाम हैं 
 अँधेरे झरोखें में बस ये एक नाम हैं 

आज़ाद पंछीओ से आज़ादी की गुहार हैं

Friday, 24 November 2017

ज़िंदगी के सफर का ये भी एक किस्सा हैं
फ़ेहरिस्त हज़ार गुमसुम ख्वाहिशें का बसेरा हैं 
आगाज मंज़िल का कबतक एक और नया सबेरा हैं 
मुस्कुराइए जिंदगी की यात्रा का ये भी एक हिस्सा हैं 

Thursday, 9 March 2017

गुनगुना रही अल्हड़ सी शामें 
शोर मचा रही ये ख्वाहिशें
हर बातों पे जो हो रही हंसी  
खोने ना दे ये पल की ख़ुशी  

बदली बदली सी जुनून की मस्तियाँ 
करने दे कुछ नयी नयी नादानियां 
आँखों में लहराती ये मनमानियां 
मन में बहने दे ये बदमाशियां

उड़ने दे बेफिक्रे से ये मन 
करने दे कुछ उमंगों सा पागलपन 
हवाओं में बहती ये खुशियां 
मचलने दे दो पल ज़िन्दगियाँ

गुनगुना रही अल्हड़ सी शामें 
शोर मचा रही ये ख्वाहिशें
हर बातों पे जो हो रही हंसी  
खोने ना दे ये पल की ख़ुशी  

आँखों में लहराती ये मनमानियां 
करने दे कुछ नयी नयी नादानियां 
उड़ने दे बदमाशियों सा ये मन
करने दे कुछ उमंगों सा पागलपन 


हवाओं में बहती ये खुशियां 
मचलने दे दो पल ज़िन्दगियाँ






Tuesday, 7 March 2017

कही कुछ अनकही सी धुप 
चुभने लगी है ये जो सर्द नूर
फिसलता जिंदगी का जैसे कोई सुर  
मन में बहती ये बेताबी की कश्तियाँ 
आँखों में समाती जुनून की मस्तियाँ 
उड़ते आज़ाद बेफिक्रे पंछियो सा मन 
झिलमिलाते उमंगों सा जो पागलपन
खिलखिलाते आवाज़ों का चिलमन 
हवाओं के झोकों सी अब ये जिंदगी 
मचलती दो पल झरोखे से जिंदगी