Saturday, 5 December 2020

जाडे़ का इक कारवाँ 

सर्दियों की ओस 

बेताबियां भी कभी सर्द लम्हें छू लेती है 

जाने जाडे़ का अहसास हैरान जिंदगी में 

कब गुनगुनी सर्दियों का इतमीनान ले बैठता है 

Tuesday, 29 September 2020

इक कश तो आह भर 

पल पल में बहार  

इक पल में ही 

बारिश की फुहार 

वक्त बेवक़्त बहती 

रूमानी पुरवाइयाँ 

घड़ी भर गुनगुनाती 

धूप लम्हां लम्हां 

ख्वाहिशों के बादल 

ओढ़े शामों सहर 

कही अनकही छांव की 

करवट हर पहर 

रुबेरु हो इक दफ़ा 

तेरा फ़लसफ़ा 

ये शहर है जो दिलक़श 

इक कश तो आह भर 



Thursday, 17 September 2020

ये मन कभी सँभलता ही नहीं 

सांसें अब मेरी बेकाबू सी रही 

जानें कैसा खुमार 

है दिल पे चढ़ा 

खानाबदोश राहों पे ही 

क्यों ये चल पड़ा 


ये मंज़र मेरे रंग सा है 

बेफिक्र उड़ता फिरता मैं 

ये जहाँ सारा मलंग सा है 

थोड़ी सी धुप है छाँव है 

खुली दिशाएं और 

मंज़िल अनजान कहीं 


सफर में छिपी कैसी ये धुन है 

फिकरे सारी कहाँ गुम है 

बेगानी राहों पे संग ये परछाइयाँ 

मिलों दूर, दूर तक बस मेरी बेताबियाँ 


थोड़ी सी है ज़िन्दगी ये बेरुखी क्यों ?

देखो मौसम ने ली है करवटे 

रूखे सूखे रास्तों पे 

गुदगुदा रही ये बेचैन हवाएं

हर तरफ हर लम्हों में आवारगी 

हम चले है ये राहें अनकही 










e man kabhi sambhalta hi nahi 

Saanse ab meri Bekabu si rahi

Jaane kaisa khumar hai 

dil pe chadha 

Khanabadosh raho pe hi 

Kyu ye chal pada 


Ye manzar mere rang sa hai

Befikar Udta chadta parinda 

Ye jahan saara malang sa hai

Ye savera hai naya

Manmauji lfange


Safar me chhipi kaisi ye dhun hai

Fikre saari kahan gum hai

Begani raho pe dhundhti bechaniya 

Milo door Door tak bas meri betabiyan 


Rubooru ye shahar ye gaon 

Ye banshide ye gharonde 

Chhode hai saare sapne

Tumhare ab hai Hawale 













Saturday, 8 August 2020

उलझी है ख्वाहिशें 

सुलझाने को हम 

निकल पड़े है दूर 

दूर कहीं खुले आसमां में 

बेफिक्रे से ये जहां में 

सरसराती हवाओं में 

उड़ते फिसलते से 

खोये खोये 

बचकाने बहके ख्यालों में 

चल पड़े है हम

ये रास्ते 

जाना कहाँ

किसको पता  

ये पता लापता ही सही 

गुजरते कुछ अनकहे 

ये मौसम नये से है 

सांसो को थामे

हर पल ढूंढे बेताब बंजारे 

ये पल जो नये से है 

खुलते लम्हे 

अलसायी शामों में 

मिलते सफर से 

सुकून के दो पहरे

जैसे बादल बरसे

खानाबदोश दिल पे

मंज़िल मेरी कहाँ ?

फिकरे कल की क्या 

कल के किस्सों में 

क्यों रहना 

नये नये फ़साने उड़ते 

मिलते राहों में है खुलते 

ये सफर भी कुछ अजीब सा है 

जाने कहाँ से है शुरू

कहाँ हो खत्म 

ये पल कुछ अनोखा है 

ये सफर बस एक झोका है 

इन निगाहें में चढ़ते गए

मंज़र नये नये

और बनता गया 

ये कारवाँ.......... 

Ye man kabhi sambhalta hi nahi 

Saanse ab meri Bekabu si rahi

Jaane kaisa khumar hai 

dil pe chadha 

Khanabadosh raho pe hi 

Kyu ye chal pada 


Ye manzar mere rang sa hai

Befikar Udta chadta parinda 

Ye jahan saara malang sa hai

Ye savera hai naya

Manmauji lfange


Safar me chhipi kaisi ye dhun hai

Fikre saari kahan gum hai

Begani raho pe dhundhti bechaniya 

Milo door Door tak bas meri betabiyan 


Rubooru ye shahar ye gaon 

Ye banshide ye gharonde 

Chhode hai saare sapne

Tumhare ab hai Hawale 


















Wednesday, 29 July 2020

In dino
Zindagi ko jaane 
kya sujhna laga
Sirfire se bhagte 
Vakt ko thaam ke
ladkhadate rasto pe kahi
Chal pade hai hum
Mastiyan manmarjiya 
Chadne lagi 
Khul ke aane lagi 
dil me jo saari dillagi 
Roke se bhi na ruke ab ye Silsile 
Hai jo ye khwahisho ke kaafile 

Uljhi hai Khwahishe 
Suljhane ko hum
Nikal pade hai door
Door khule aasmaan 










Tuesday, 14 July 2020

ज़िंदगी इक कारवाँ 

गुनगुना रही अल्हड़ सी शामें
शोर मचा रही ये ख्वाहिशें
राहों में जो हो रही है बदमाशियां
होने दे कुछ नयी नयी नादानियां 
उड़ते से ये बेफिक्रे मन
करने दे ख्यालो को पागलपन
होश में रहना है क्यूं
सवाल जब कल पे हो
बेहोशी में है मज़ा
नशे के ये जो पल हो
बेफिक्र ज़िंदगी
मलंग सी ख्वाहिश लिए
गम सारे भुला के रास्तें यूँ चल दिए

Friday, 26 June 2020

फिर ये मुसाफिर
समंदर के रेत पे
अपने शहर के निशां
यादों के कारवां को
एहसास करने

देखना दोस्त
ये यात्री जल्दी वापस लौट आएगा
मायानगरी की चकाचौंध भरे
उसी Marine Drive किनारे
अपने अधूरे किस्सों के बस्ते खोले
सफर के हिस्सों को मुकम्मल जीने 

फूहड़ एलियन आते है जब 

फूहड़ एलियन आते है जब
यही कही आँखे उबलने लगती है
दो चार वक्त क्या आया
हंसी रौंद चहेरे पे झाग कूटने लगते है
अब सुनो क्या करना है
हाँ, जमीं पे फेंक पैरों से कुचल दो
कह दो आने वाले नौसिखिये से
चीनी पे घोल गोल गोल बताशे उछाले है
जरा मढ़वा ले तुम्हरी छाती पे बैठ
कहकहे जो छूटे है
ये जिन्दा ज़िंदगी है
और दो चार चवन्नी लूटना है

Tuesday, 23 June 2020

क्या आलम है! गड़हों पे टक 

चौखट से लगती सँकरी गली
खुलती मेन सड़क पे
सड़क से सटे फुटपाथ पे
किवाड़ पे साँकर डाले
तर-बतर बिकाऊ चीज़ पे छज्जा खींच
दुबके सावन से बचते पॉटर!

बाहर इक्का दुक्का ही
मोम की बरसाती से ढंके
बचे खुले आसमां तले भीगते
टेराकोटा की जमी क्यारियों पे
आती बौछारों की छड़ी
भीनी भीनी सोंधी खुशबुएँ
जमे रास्ते से गुजर रहा हूँ
वाकई क्या आलम है! गड़हों पे टक

Sunday, 21 June 2020

गिरता आज एक धूमकेतु देखा 

यादों पे गुजरता
गिरता आज एक धूमकेतु देखा

जाने देहरी पे खजाने सा गड़ा
क्यों ताउम्र ये पिंड छोड़ गया
जिसकी सतह पे जमे
खुशियों के बेहिसाब कण
हक़ से मंज़िल खींच
ख्वाबों के नुक्लेओस

सूरज की तमाम तपिश लील किये
फटा सूती चोला ओढ़े
जाने ये फरिश्ता किस ओर चला गया

आज फिर यूँ लगा
चिलचिलाती ज़िंदगी पे
धूमिल से गया ये सुपरनोवा

कश्मकश चेहरे की उदास ख़ामोशी देख
अनगिनित सितारों तले मशक्कत
फिर एक उम्मीद का उजला पुच्छल तारा
फिर मेरे अब्बा ने मेरे लिए भेजा है
देखना इक रोज़ तुम भी
मेरे इस तथ्य को सच मानोगे 

Tuesday, 16 June 2020


इन पहाड़ो के नशे करके देखना

किसी ख्यालो पे आतुर जागे हो
कही दिल में बेचैनी के धागे हो
तो दोस्त एकबार
इन पहाड़ो के नशे करके देखना
वाष्प से जमे धूमिल भ्रमजाल
यही झणभंगुर ना जाये तो बताना

झांकना आके इस जादुई दुनिया में
देखना दोस्त
तुम्हारे बेताब धागे से बुनते लिबास को
जिस पे उकेरे मायावी उसूलों से परे
जो खोये तुमने अतीत के छलावे तले
तुम्हारे सपनो के पुलिंदे

दबे छिपे जितने भी हो सपने अंत में
छोड़ देना इन विशाल खुले आसमां तले
अनंत सितारों के बीच उड़ते परिंदे
पहुंचा देंगे तुम्हारे ख्वाबो के किनारे

कल्पनाओं के अंत खोजते
देखना दोस्त अंत से ही तुंम
खुद में एक नयी शुरुआत ढूंढ लाओगे
जब मिलोगे वापस मुझसे तो कहोगे
की मैं झूट नहीं बोलता
ये रहस्मयी नशे वाकई काम के है