Friday, 10 February 2017

अनजान सा मुसाफिर हूँ 
कुछ रास्ते भटक गया हूँ 
जिन शहरों को पीछे छोड़ा था कभी 
उन्ही रास्तों पर आज फिर सफर कर रहा हूँ 
अजनबियों की भीड़ में कुछ तन्हा सा हो चला हूँ 
कुछ आशियाने थे अपने कभी 
अब वही नीड़ किसी ओर के हमराही हो चले है  
कुछ अनसुनी अनजानी कहानियां सफर के  
किसी पड़ाव पर छोड़ आया हूँ 
बीते हुए कल की स्मृतियों को भुला कर 
कुछ कदम आगे बढ़ा दिए है 
क्यों की आज भी कुछ सफर अधूरे है। 



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