Friday, 24 February 2017

नन्हे हाथों से बनी वो कागज की नावें 
जो कभी थी बचपन की धुंधली यादें 

उन चुस्त गलियों में था कभी बल्लों का शोर 
जिस गली में था शर्मा अंकल के घर का झोर 

नुक्कड़ की चाय का भी अपना अजीब रंग था 
जब ठहाकों से भरा मित्र मण्डली का संग था 

कुछ आम के पेड़ों की डालिया तभी टूटती थी 
जब दोस्तों की टोलियां उस पर छूटती थी 

जब जब बॉल लाने की बारी हमारी हुआ करती थी 
तभी शुक्ला अंकल के कुत्ते की रखवाली हुआ करती थी 

कुछ दोस्तों के टिफ़िन कभी बचते नहीं थे 
क्यों की कुछ यारों के पेट कभी भरते नहीं थे 

हमेशा स्कूल के आने की घंटी सजा लगती थी 
तो वही स्कूल के जाने की घंटी मजा लगती थी

जब इम्तिहान के दिन पास आया करते थे 
तभी सब दोस्तों को फ़ोन जाया करते थे  

गर्मियों में बर्फ के गोलों की चुस्कियों का मजा भी अलग था 
पर उसके लिए घरवालों से पैसे लेने की सजा भी अलग थी

जब हैरी पॉटर की जादुई दुनिया में इतने खो जाते थे 
पता नहीं कब जादु के सपने देखते देखते सो जाते थे 

रविवार का इंतज़ार जब सोमवार से ही शुरू हो जाता था 
तब पता नहीं रविवार कब सोमवार में बदल जाता था  

जब सारा सारा दिन मारियो खेलने में निकल जाता था  
तो वही रात घरवालों की फटकार में गुजर जाया करती थी 

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