Thursday, 11 June 2020

 ये फ़ितूरिया ज़िंदगी जी आया 

 कुछ देर ठहर गया
 ज़िंदगी पे सेता आया

 बाकी ख्वाहिशों की मर्ज़ी
 रास्तों पे लम्हे हैरत जाये
 या फिर लम्हों में रास्ते कट जाये

 बदलते पल पल बेतरतीब हालत में
 हिचकोले भरते जो मनमोजी ख्यालात थे

 मेरी ज़िंदगी तो बस लबालब जी आयी
 मिलती हैरानियों से उमर तक सीख आयी

 ख्वाबों के समंदर पे खुलते हर वो सवेरे
 आवारा हसरतो से मिलती हर वो शामें

 रंग रंग उड़ते नज़ारे पकड़ती ये निगाहे
 जैसे ज़िंदगी पे ज़िंदगी खुल के बरस आयी

 खाके में खुद का ना ढाल पाया
 इस बेढंगे पे क्या मलाल रखूं

 कुल्हड़ पे गरमाती चाय के कश भर
 ये फ़ितूरिया ज़िंदगी जी आया








No comments:

Post a Comment